एक राजा किसी साधु को अपना रत्न भंडार दिखाने ले गया। वहां उसने साधु को अपने संग्रह किए हुए तरह-तरह के रत्न दिखाए। फिर उनकी विशेषताओं से परिचय कराते हुए कहा-'ये सारे रत्न अत्यंत कीमती हैं।” साधु ने राजा की सब बातें निर्विकार ढंग से सुनीं। राजा के रत्नों को साधु ने उपेक्षा की दृष्टि से देखा। रत्न भंडार से बाहर निकलने के बाद जब राजा ने साधु से उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उसने कहा-''मैंने आपके उन सभी रत्नों से भी बड़ा एक रत्न देखा है। खास बात यह है कि उस पर पहरा भी नहीं लगाया जाता। इसके साथ ही वह रत्न एक व्यक्ति के जीवन निर्वाह का साधन भी हर दिन जुटा देता है।'' राजा आश्चर्य में पड़ गया। उसने साधु से वह रत्न दिखाने की प्रार्थना की।साधु उसे अपने साथ लेकर एक बुढ़िया की झोंपड़ी में पहुंचा और वहां रखी आटा पीसने की चक्की दिखाकर बोला-“जैसे पत्थर के टुकड़े तुम्हारे पास हैं, उनसे कहीं बड़ा यह पत्थर है। यह अनाज पीसता है और इससे पीसने वाले का पेट भरता है। देखो, इसकी चौकसी की भी जरूरत नहीं पड़ती।” साधु की बात सुनकर राजा के ज्ञान चक्षु खुल गए। उस दिन से उसने रत्नों के प्रति मोह छोड़ दिया और प्रजा की भलाई के कार्यों में जुट गया।
